लघु कथा
स्नेह और सम्मान
आकाश की बहन की आज शादी है। घर में जोर शोर से तैयारियाँ चल रही है। उसे दम मारने की भी फुर्सत नही। उसकी मित्र मण्डली भी उसका हाथ बटा रही है। एक तरफ मिठाइयाँ बन रही है ,दूसरी तरफ मण्डप सज रहा है ,मेहमानों से घर भरा हुआ है,बच्चों की धमा चौकड़ी के क्या कहने। आकाश अपनी बहन नीरिजा से बस दो साल छोटा है ,दोनों की खूब बनती है।
शादी फिर विदाई। घर सुना हो गया। इतने दिनों के हलचल के बाद ये सूनापन। आँखे बंद किये आकाश निढाल पड़ा उन पुराने दिनों में खो गया जब दोनों साथ-साथ स्कूल जाते थे। दीदी शांत स्वभाव की और मै खूब बाते बनाता ,उसे चिढाता भी। दीदी साथ चलने को कहती पर मैं रिक्सा में पहले बैठने के लिए दौड़ पड़ता। हमेशा की तरह स्कूल की छुट्टी के बाद दौड़ता हुआ निकला तभी अचानक एक पागल कुत्ता सामने आ गया डर के मारे मैं कांपने लगा ,पीछे से दीदी आ रही थी उसने खीचकर अपने ओट में छुपा लिया और खुद कुत्ते के सामने खड़ी हो गई। सब कह रहे थे भागो पागल कुत्ता है ,भगवान का शुक्र कोई दुर्घटना नहीं घटी। दीदी ने मुझे बचा लिया था। उस समय मेरे मन में क्या भाव उठे होंगे याद नहीं पर आज मन बहुत भावुक हो रहा है ,दीदी के लिए स्नेह और सम्मान हमेशा मेरे ह्रदय में रहेंगे।
---नीना मंदिलवार
द्वारा परितोष कुमार
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