शिव धाम बना शमशान
कितने बहे ,कितने दबे
कितनो ने अपनों को खोया
देश का हर कोना आहत है
श्रद्धा से शीश झुकाने आए थे
इन शीशों की बलि लेने विपदा
कैसे आई ?
हर ओ आदमी जिसे तनिक भी था भान
चाहे बुद्धिजीवी हो ,सरकार हो ,पत्रकार हो
या हो आम इंसान ,
सब है जिम्मेवार ,हम सब है कटघरे मे
जिस प्रकृति ने संवारा हमे
उसी से खिलवाड़ किया
अंजाम से अनजान
प्रकृति भी कटने ,रोदने पर
सिसकती होगी .
आगाह कराती होगी
आदतन अपने धुन मे खोये रहना
कितना भारी पड़ा
प्रकृति को न समझना .
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